Matric Exam 10th Questions Answer बिहार बोर्ड मैट्रिक परीक्षा महत्वपूर्ण प्रश्न उत्तर तैयारी के लिए।।

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1. नाभादास का जन्म संभवत: 1570 ई. में दक्षिण भारत में हुआ था । इनके पिता बचपन में ही चल बसे और इलाके में अकाल पड़ गया, जिस कारण वे अपनी माताजी के साथ राजस्थान में रहने आ गये। दुर्भाग्यवश कुछ समय पश्चात् इन्हें माता का विछोह भी सहना पड़ा। तत्पश्चात् ये भगवान की भक्ति में लीन रहने लगे गये और अपने गुरु और प्रतिपालक की देखरेख में स्वाध्याय और सत्संग के माध्यम से ज्ञानार्जन करने लग गये । कवि नाभादास स्वामी रामानंद शिष्य परंपरा के स्वामी अग्रदासजी के शिष्य थे और वे वैष्णवों के निश्चित सम्प्रदाय में दीक्षित थे जबकि अधिकांशतः विद्वानों के अनुसार कवि जन्म से दलित वर्ग के रहनेवाले थे किन्तु अपने गुण, कर्म, स्वभाव और ज्ञान से एक विरक्त जीवन जीने वाले सगुणोपासक रामभक्त थे । कवि नाभादा का अविचल भगवद् भक्ति भक्त- चरित्र और भक्तों की स्मृतियाँ ही अनुभव सर्वस्व है। इनकी मुख्य रचनाएँ भक्तमाल, अष्टयाम (ब्रजभाषा गद्य) (‘रामचरित’ की दोहा शैली में), रामचरित संबंधी प्रकीर्ण पदों का संग्रह है । कवि नाभादास गोस्वामी तुलसीदासजी के समकालीन सगुणोपासक रामभक्त कवि थे जिनमें मर्यादा के स्थान पर माधुर्यता अधिक मिलती है। इनकी सोच और मान्यताओं में किसी प्रकार की संकीर्णता नहीं बल्कि ये पक्षपात, दुराग्रह, कट्टरता से मुक्त एक भावुक, सहृदय विवेक सम्पन्न सच्चे भक्त कवि हैं। लेखक ने अपनी अभिरुचि, ज्ञान, विवेक, भाव-प्रसार आदि के द्वारा प्रतिभा का प्रकर्ष उपस्थित किया है।

कवि की रचना ‘छप्पय’ ‘कबीर’ और ‘सूर’ पर लिखे गये छः पंक्तियों वाले गेय पद्य हैं। कवि द्वारा रचित ‘छप्पय’ भक्तभाल में संकलित 316 छप्पयों और 200 भक्तों का चरित्र वर्णित ग्रन्थ है, में उद्धृत हैं। ‘छप्पय’ एक छंद है जो छः पंक्तियों का गेय पद होता है । जो नाभादास की तलस्पर्शिणी अंतदृष्टि, मर्मग्राहणी प्रज्ञा और सारग्रही चिन्तनशैली के विशेष प्रमाण हैं । अथवा, आदि काल के कवियों के नाम- (क) कालीदास (ख) सूरदास (ग) कबीरदास (घ) जायसी (ड़) प्रेमचन्द्र (च) तुलसी दास (छ) विद्यापति (ज) बिहारी लाल।

2. (क) पेशगी शीर्षक कहानी का सारांश अपने शब्दों में लिखें । उत्तर- हेनरी लोपेज द्वारा लिखित कहानी “पेशगी” में तथाकथित सभ्य समाज द्वारा शोषण एवं उत्पीड़न का अत्यन्त स्वभाविक एवं संवेदनशील चित्रण है। संपन्नता तथा विपन्नता के बीच की विस्तृत खाई की सफल प्रस्तुति प्रस्तुत कहानी “पेशगी” । कितना अन्तर है मालकिन तथा उसकी धाया (नौकरानी) के पारिवारिक जीवन में । वस्तुतः यह समाज में व्याप्त असमानता की ओर संकेत करता है।

कहानी ‘पेशगी’ अफ्रीकी देश कांगों के सामाजिक जीवन की विसंगति पर प्रकाश डालती है। संभ्रान्त और फ्रांसीसी परिवार से इनका संबंध है । उस परिवार में कारमेन नामक एक अफ्रीकी मूल की नौकरानी काम करती है । उस बंगले का चौकीदार फार्डिनांड नामक वयोवृद्ध है। मालकिन इस पूरी महानी में “मैडम” कहकर संबोधित किया है। अतः मैडम उसके नाम का पर्याय हो गया है। मालकिन की एक नन्हीं सी पुत्री “फ्रैंक्वा” है जो अपनी माँ के दुलार में कुछ जिद्दी एवं चिड़चिड़ी हो गई है। कारमेन (नौकरानी) उसको बहुत प्यार करती है तथा उसे हमेशा खुश देखना चाहती है। दिनभर उसकी छोटी लड़की फ्रैंक्वा की देखभाल में कारमेन का समय बीतता है । इसके अतिरिक्त उस बंगले के अन्य कार्य भी उसे करने पड़ते हैं। फ्रैंक्वा अक्सर मचल जाती है किसी बात पर अड़ जाती है । उस समय नौकरानी कभी-कभी डाँटकर तथा कभी स्नेह तथा ममतापूर्ण शब्दों से उसके सिर पर हाथ फेरते हुए समझाती है, क्योंकि बच्ची के प्रति उसका वात्सल्य उमड़ पड़ता है। अपने बेटा हेक्टर के समान ही वह फ्रैंक्वा को मानती है। कारमेन को अपने गाँव माकेलेकेले बंगले पर पहुँचाने में एक घंटा से अधिक समय लग जाता था। लेकिन जब तक फ्रैंक्वा सो नहीं जाती थी तब तक वह उसे लोरी सुनाकर घुमाती रहती थी। चाहे रात अधिक भी बीत जाए अपने घर लौटने के लिए। मालकिन कभी-कभी नाराज होकर कुछ कटु शब्द बोल दिया करती थी। चौकीदार फार्डिनॉड का कहना है कि मैडम (मालकिन) के पति जब उन्हें पीटते हैं तो वह नौकर नौकरानियों पर अपना गुस्सा उतारती है । कारमेन कभी गैरहाजिर नहीं होती, उसे भय रहता है कि यदि वह अनुपस्थित हुई तो नौकरी से निकाल दी जाएगी। इस आशय की चेतावनी मैडम उसे दे चुकी है। इस प्रकार लेखक ने सामाजिक विषमता का बड़ा मार्मिक वर्णन इस कहानी में किया है। एक ओर संभ्रांत फ्रेंच परिवार है तो दूसरी ओर अफ्रीकी कबिलाई परिवार जो दरिद्रता शोषण एवं उत्पीड़न का साक्षी है।

अथवा, ‘गाँव का घर’ – गाँव का घर ज्ञानेन्द्रपति समकालीन कवि हैं वे नवपूँजीवाद और आर्थिक उदारवादी के कारण ग्रामीण संस्कृति में जो बहुआयामी बदलाव आया है उस संस्कृति को नष्ट होता हुआ देख दुखी होते हैं। उन्होंने जो बचपन के दिन गुजारे हैं वह स्मृतियों में बस जाता है। इसलिए वे गाँव का घर याद करते हैं । कवि घर के अंतःपुर की चौखट याद करता है वह देखता है कि घर के चौखट से पार होकर जैसे ही बाहर निकलता है तो बदलाव देखकर क्षुब्ध होता है । वह तरह-तरह के उपमाओं द्वारा कहता है कि जिस घर के भीतर खाँस कर आना पड़ता था अर्थात् घर नयी कन्याओं के आने पर बुजुर्ग लोग घर में प्रवेश करने से पहले खाँसते हैं, खड़ाऊ खटकाते हैं या उठकर पुकारते हैं यह सब नयी संस्कृति के प्रभाव से नष्ट हो रहा है। कवि अपनी इस परम्परा को खोना नहीं चाहता है। इसलिए गाँव का घर बराबर उसकी स्मृतियों में आते हैं । उस गाँव में जब भी कोई लड़ाई झगड़ा होती थी तो लोग पंच परमेश्वर बनाकर उसका निदान करते थे परन्तु अब अदालतों का चक्कर काटना पड़ता है। यही नहीं अब लालटेन का प्रकाश नहीं दिखता बल्कि बिजली आ गयी है। बेटे के विवाह के दहेज में टीवी माँगने लगे हैं अब लोकगीतों की धुन कम सुनाई पड़ती है उसकी जगह मदमस्त आर्केस्ट्रा ने ले ली है। उस लोकसंस्कृति में कहाँ होरी चैती विरहा-आल्हा गूँजते थे अब वह लोकगीत के समान लगता है। पहले सर्कस दिखाए जाते थे अब वह मानों कहीं खो गया है । गाँव की संस्कृति वैसी प्रतीत होती जैसे हाथी का गजदंत ‘नहीं हो। हाथी का सौन्दर्य उसके दाँत होते हैं । दाँत के बिछुड़ने पर वह दन्तविहीन हो जाता है उसी प्रकार गाँव का सौन्दर्य उसकी लोक संस्कृति है । वह उन्हीं गजदंतों के समान टूट गया। कवि शहर की चकाचौंध में देखता है कि लोग बीमारी के कारण अस्पतालों में और लड़ाई-झगड़े के कारण अदालतों का चक्कर काट रहे हैं। गाँव के घर की रीढ़ इनसे काँप उठती है। अर्थात् ग्रामीण संस्कृति को चोट पहुँचता है।

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