Matric Exam 2024 मैट्रिक परीक्षार्थियों के लिए महत्वपूर्ण प्रश्न उत्तर तैयारी के लिए।।

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लघु उत्तरीय प्रश्न

1. देखें 2012, प्रश्न संख्या-5 का उत्तर

2 एक क्रम पर उपस्थित वे जीन अथवा एतील जो अर्द्धसूत्री विभाजन के समय एक दूसरे से अलग हुए बिना पीढ़ी-दर-पीढ़ी स्थानांतरित होते. रहते हैं, एक-दूसरे के सहलग्न होते हैं। ऐसी घटना को सहलग्नता कहते हैं।

3. रेबीज बीमारी के कारण घातक रेवडी वाइरस से rabies रोग उत्पन्न होता है। यह वाइरस कुत्ते, चमगादड़, गीदड़ आदि जनुओं में पाया जाता है। कोई भी रैविड जन्तु जब किसी मनुष्य को काटता है, तो उसके लार के साथ वाइरस उस मनुष्य में प्रवेश कर उसके मस्तिष्क में चला जाता है। मनुष्य के केन्द्रिय तंत्रिका से फिर लार में चला जाता है। इस रोग से ग्रसित रोगी 3- 5 दिनों में मर जाता है। कभी-कभी यह रोग संक्रमण के एक वर्ष बाद भी हो सकता है।

लक्षण-सिरदर्द, गर्दन दर्द, सामान्य बुखार काटे हुए स्थान पर काफी दर्द, क्रोध एवं चिड़चिड़ापन इस रोग के प्रमुख लक्षण हैं। रोगी जल से भय खाता है, इसलिए इस रोग को हाइड्रोफोबिया कहते हैं। इस रोगी की कोई विशेष दवा नहीं है।

नियंत्रण-रेविड जानवर के काटने पर उस स्थान को तुरंत साबुन और पानी से धोना चाहिए एवं एंटीरेबिज सीरम देना चाहिए। फिर human diploid cell vaccine एवं rabies vaccine absorbed का टीका 5 दिन तक लगातार देना चाहिए।

4. (i) शराबती सोनोरा जल्दी पकने वाली (II) लेरमा राजा गेरूआ

रोग निरोधी, (iii) सोनारा 64-देर से बुआई के लिए उपयुक्त, (iv) कल्याण सोना-अधिक वर्षा वाले क्षेत्र के लिए उपयुक्त, (v) मोती एच. डी. रोटी बनाने के लिए अधिक उपयुक्त।

5. बहुविकल्पता (Multiple allelism) मंडल के सिद्धांत के अनुसार गुणों या लक्षणों को निर्धारित करनेवाले जीन्स दो ऐलीलोमॉर्फिक रूपों में पाए जाते हैं, लेकिन बाद में यह साबित हुआ कि कई लक्षण दो से ज्यादा ऐलीलों के द्वारा निर्धारित होते हैं, जैसे खरगोश के शरीर के रंग के लिए चार अथवा अधिक ऐलील पाए जाते हैं। जब किसी एक लक्षण के लिए दो से ज्यादा वैकल्पिक ऐलील जिम्मेदार हो तो ऐसे ऐलील को बहुविकल्पी ऐलील एवं इस प्रकार की स्थिति को बहुविकल्पता कहते हैं।

6. रिस्ट्रीक्शन एण्डोन्यूक्लियोज जीवाणुअसों में पाया जाने वाला एन्जाइम है, जो विषाणुओं की वृद्धि को रोकता है। ये एन्जाइम विषाणुओं के डी.एन. ए. पर आक्रमण कर उसे नष्ट कर देते हैं। इस एन्जाइम में प्रतिरोधक क्षमता होती है, जो जीवाणुओं की विषाणुओं से बचाते हैं। रिस्ट्रक्शन इण्डोन्यूक्लियोज का उपयोग आनुवंशिक अभियांत्रिकी में किया जाता है। यह एन्जाइम डबल स्ट्रैंडेड डी.एन.ए. को विशेष स्थान पर काटता है। इस एन्जाइम का उपयोग कर रिकॉम्बीनेन्ट डी.एन.ए तैयार किये जाते हैं, जो विभिन्न स्रोतों या जीनोम से प्राप्त डी.एन.ए. से मिलकर बना होता है। रिस्ट्रीक्शन एण्डोन्यूक्लियोज का मुख्य उपयोग भौतिक प्रतिवर्धन मानचित्र बनाने, डी.एन.ए. जीनोम की सिक्यॉसिंग, जीन लाइब्रेरी एवं क्लोनिंग में किया जाता है।

7. एंटीबडी के पाँच वर्ग निम्नलिखित हैं- (i) एम्युनोग्लोब्यूलिन G (lgG) सेरम में (ii) इम्युनोग्लोब्यूलिन (M (IgM) रूधिर में (iii) इन्युनोग्लोबयूलिन A (lgA) तार, पसीना, अश्रु इत्यादि में (iv) इम्युनोग्लोब्यूलिन D(lgD) लिम्फोसाइट के ऊपर रहता है (v) इम्युनोग्लोब्यूलिन E (IgE) सेरम में।

8. मानव समाज में 2 से 10% तक ऐसे दम्पत्ति (married couples) होते. हैं जो सन्तानोत्पत्ति करने में असफल रहते हैं। ऐसे दम्पत्तियों को लोग बाँझ (infertile) और इनकी इस अक्षमता को बाँझपन (infertility) कहते हैं। स्त्रियों में बाँझपन की दो श्रेणियाँ होती हैं-प्राथमिक बाँझपन (primary infertility) तथा द्वितीयक बाँझपन (secondary infertility) प्राथमिक बाँझपन में विवाह के एक साल के बाद भी स्त्री गर्भवती नहीं हो पाती। द्वितीयक बाँझपन में स्त्री गर्भवती तो हो जाती है, परन्तु गर्भ पूरे समय तक टिकता नहीं, बीच में ही गर्भपात (abortion) हो जाता है।

यदि पुरुष में शुक्राणु संख्या सामान्य है तो चिकित्सक स्त्री के जननांगों का परीक्षण करते हैं। स्त्रियों की अक्षमताओं के कारक मुख्यत इनके अण्डाशयों में अण्डजनन एवं अण्डोत्सर्ग की गड़बड़ियाँ, गर्भाशयी नालों तथा गर्भाशय की असाधारण संरचना, तथा गर्भाशय एवं योनि में संक्रमण आदि होते हैं।

9. शुक्राणुजनन : नर के वृषण में स्थित अपरिपक्व नर जनन कोशिकायें जिस विधि द्वारा परिपक्व शुक्राणुओं का निर्माण करती है, उसे शुक्र जनन कहते हैं। शुक्र जनन नलिकाओं के भीतरी भित्ति में उपस्थित शुक्राणु जन द्विगुणित होते हैं तथा समसूत्री विभाजन द्वारा अपनी संख्या बढ़ाकर प्राथमिक शुक्राणु कोशिकाओं का निर्माण करते हैं। कुछ प्राथमिक शुक्राणु कोशिकाओं में प्रथम अर्द्धसूत्रण विभाजन होता है जिससे द्वितीय शुक्राणु कोशिकायें बनती है। इनमें पुनः द्वितीय अर्द्धसूत्रण विभाजन होता है जिससे चार अगुणित शुक्राणु प्रशू का निर्माण होता है । ये रूपान्तरित होकर शुक्राणु का निर्माण करते हैं। यह प्रक्रिया शुक्राणु जनन कहलाती है। इसके उपरान्त विकसित शुक्राणु शीर्ष सर्टोली कोशिकाओं में अन्तः स्थापित हो जाता है।

अंडजनन : बालिकाओं में भ्रूणावस्था में ही प्राथमिक जननिक कोशिकाएँ बारम्बार समसूत्री विभाजन द्वारा लाखों डिम्बाणु जन कोशिकाएँ बना लेती हैं। अधिकांश का क्षय हो जाता है तथा कुछेक प्राथमिक अण्डक कोशाएँ बनाती हैं। इनमें प्रथम अर्धसूत्री विभाजन होता है जो अपूर्ण रहता है। इनमें से केवल लगभग 400 कोशिकाएँ स्त्री के पूरे जीवन काल में परिपक्व होकर अण्डाणु बनाती है। इसी प्रक्रिया को अण्डाणुजनन कहते हैं।

10. (a) आँकड़ों की लाल किताब सर्वप्रथम 1963 में अन्तर्राष्ट्रीय प्राकृतिक संरक्षरण संघ के द्वारा प्रकाशित की गयी जिसमें दुनिया भर के उन पौधों और जीवजन्तुओं का विवरण और सूची है जिनका अस्तित्व गहरेसंकट में है तथा जो विलोपन के कगार पर हैं। (b) घासस्थल में पेड़ों तथा झाड़ियों का सर्वथा अभाव होता है, किन्तु र सवाना में पेड़ों तथा झाड़ियों के क्षेत्र पाये जाते हैं। अधिकतर सवाना मानवकृत हैं। सभी सवाना की उत्पत्ति मौलिक उष्णकटिबंधीय वनों के अपघटन से हुई है।

11. प्रतिबंधन एन्डो न्यूकिल एज इंजाइम DNA को विशेष स्थान पर काटकर उसके टुकड़े कर देता है। इन खंडों को जिस तकनीक द्वारा अलग कर सकते हैं उसे जेल वैद्युत का संचालन (Ge Electrophoresis) कहते हैं। इलेक्ट्रोफोरेसिस में माध्यम के रूप में ऐगरोज का उपयोग किया है | डबल स्ट्रैडेड DNA इलेक्ट्रोफोरेसिस के द्वारा सिंगल स्ट्रेंडेड DNA के रूप में अलग हो जाता है, पृथक्कृत DNA को नाइलोन शीट पर स्थानांतरित किया जाता है जो जेल पर रहता है। यह सादर्न ब्लॉटिंक तकनीक है। अंत में x- फिल्म की मदद से अर्कबैंड विकसित किया जाता है।

12. जेनेटिक कोड या आनुवंशिक कूट (Genetic code) विभिन्न प्रकार के प्रोटीन्स में अंतर का कारण है कि उनकी पॉलीपेप्टाइड श्रंखलाओं में विभिन्न अमीनो अम्लों का क्रम भिन्न होता है। यह क्रम कोशाद्रव्यी राइबोसोम पर बने प्रत्येक प्रकार के प्रोटीन के लिए विशिष्ट होता है। इस क्रम की सूचना DNA की कूट भाषा में उपस्थित होती है तथा अनुलेखन द्वारा m- RNA को दे दी जाती है। अब यह आनुवंशिक सूचना m-RNA अणु में इसके न्यूक्लियोटाइड के क्रम की कूट भाषा के रूप में पहुँच जाती है जिससे प्रोटीन अणु में अमीनों अम्लों का क्रम निर्धारित होता है। सभी न्यूक्लियोटाइड्स में • पेंटोज शर्करा तथा फॉस्फेट समान होते हैं। वे एक-दूसरे से केवल क्षारकों में भिन्न होते हैं जो चार प्रकार के होते हैं : (i) Adenine; A (ii) Guanine : G (iii) Cytosine; C तथा (iv) Uracil, U। ये चारों अक्षर A, C, CU आनुवंशिक शब्दकोष की पूर्ण वर्णमाला है। m-RNA में इन अक्षरों के क्रम से आनुवंशिक भाषा बनती है जिसे अमीनो अम्ल आसानी से समझ लेते हैं तथा यह पॉलीपेप्टाइड श्रृंखला में उनके क्रम को निर्धारित करते हैं।

जेनेटिक कोड के गुण- देखें 2014 के प्रश्न संख्या 26 का उत्तर । 12. अथवा, पादप रोगों तथा पीड़कों का जैविक नियंत्रण-हमारी संपूर्ण फसल-पैदावार का लगभग 10% भाग पादप रोगाणुओं तथा पीड़कों द्वारा हर साल नष्ट हो जाता है। रासायनिक विधियाँ से इसका नियंत्रण आसान तो होता है, लेकिन अंततः ये विषैले रसायन food chain द्वारा हमारे शरीर में पहुँचकर हमें कई प्रकार से हानि पहुँचाते हैं। अत: जैविक विधियों द्वारा इनका नियंत्रण किया जाना चाहिए। पीड़कों को जैविक रूप से नियंत्रित करने के लिए प्राकृतिक परभक्षण (natural predation) का सहारा लिया जाता है । कृषक कीटों एवं पीड़कों का पूण्र रूप से नाश नहीं करते हैं, बल्कि इसे एक स्तर पर नियंत्रित रखते हैं। इसके लिए विभिन्न प्रकार के संतुलनों एवं अवरोधों का सहारा लिया जाता है। जैव-नियंत्रण के लिए खेतों में लगनेवाले पीड़कों • तथा परभक्षी के जीवन-चक्र, उनके द्वारा भोजन ग्रहण करने की विधि एवं उनके वासस्थान का अध्ययन कर उचित जानकारी प्राप्त की जाती है। जैविक नियंत्रण के तहत विभिन्न जीवों के बीच एक पारस्परिक संबंध विकसित किया जाता है जिससे किसी भी हानिकारक जीव की संख्या में अत्यधिक वृद्धि नहीं हो पाती है । इन हानिकारक जीवों का पूर्णतः नाश नहीं किया जाता है, अपितु इनपर आश्रित रहनेवाले अन्य परभक्षी तथा परजीवी कीटों की वृद्धि के लिए उचित वातावरण तैयार किया जाता है। इससे फसलों को हानि पहुँचानेवाले पीड़कों की संख्या नियंत्रित रहती है एवं पीड़कनाशियों तथा विषैले रसायनों को आवश्यकता बहुत कम जाती है। इस प्रकार जैविक विधि द्वारा पीड़कों का नियंत्रण पर्यावरण के लिए प्रतिकूल नहीं होता है।

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